सिगरेट

सिगरेट सी बन गई हो तुम
हर कश में मेरी जान लेती जाती हो
दूर रहना तुमसे मुनासिब नहीं लगता
पास रहने पर मौत की वजह बन जाती हो तुम

हर पल तुम्हे याद करना शौक नहीं है मेरा
अक्सर ज़हन में रहते हुए आदत मेरी बन जाती हो तुम
गर फकत मैं कभी भूलना चाहूँ भी जो तुम्हे
तो तनहाई के आलम में याद बनकर आ जाती हो तुम

मैं माचिस सा जलता हूँ हर बार
शमाएँ तुम्हारी जलाने के लिए
और किसी जलती सिगरेट की तरह किसी और के होंठों पर चली जाती हो तुम
गर कभी मैं तुम तक आने की कोशिश भी अगर करूं तो
बनकर धुंआ सिगरेट का पल भर उड़ जाती हो तुम

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कई हर्फ़ ढूंढता हूँ मैं

कई हर्फ़ (Words) ढूंढे है दिल मेरा

हर्फ़ जो दिल-ए-तसल्ली दें
हर्फ़ जो सारी बातें कहें

हर्फ़ जो अल्फ़ाज़ बने
हर्फ़ जो आवाज़ बने

कई हर्फ़ ढूंढे है दिल मेरा

हर्फ़ जो खामोशियाँ कहें
हर्फ़ जो आंसू बनकर बाहें

हर्फ़ जो ना लाचार हों
हर्फ़ जो दिल से निकलने को बेकरार हों

कई हर्फ़ ढूंढे है दिल मेरा

हर्फ़ जो शायरी बने
हर्फ़ जो दिल दुखी कहें

हर्फ़ जो इश्क़ का कलमा पढ़ें
हर्फ़ जो आके तुझसे जुड़ें

कई हर्फ़ ढूंढे है दिल मेरा

हर्फ़ जो तुमको बयां करें
हर्फ़ जो तुमपर आके मरें

हर्फ़ जो बात दिलों की जानते हों
हर्फ़ जो तुम्हें पहचानते हों

हर्फ़ जो कह दें हाल-ए-दिल की बात जो ज़ुबाँ कभी कह पाई नहीं
हर्फ़ जो काबू में मेरे कभी आए ही नहीं

कुछ ऐसे ही हर्फ़ ढूंढता हूं मैं

शायद सब भूल चुके हैं

हर कोई बस जिस्म ढूंढे हैं यहां
जज्बातों को समझना शायद सब भूल चुके हैं

साथ होता है हर कोई यहां
साथ निभाना शायद सब भूल चुके हैं

रुकता नहीं कोई पल दो पल किसी के लिए यहां
सालों साल किसी का मुंतज़िर होना शायद सब भूल चुके हैं

वे खालिस कैसी दुनिया है ये तेरी जहाँ
लोग दिल बहलाना तो जानतें हैं
पर दिल लगाना शायद भूल चुके हैं

जो बीत गया वो पल ही तो वापस चाहिए

आने वाला लम्हा तो आता ही रहेगा

जो छोड़ आया हूँ घर मैं अपना, वो घर ही तो वापस चाहिए
नया मकान तो कई बार खरीदा जाता ही रहेगा

जिस मंज़िल से मुंह मोड़ा मैंने मजबूरी-ए-हालात में, वो मंज़िल ही तो वापस चाहिए
नई मंज़िलें तो हर बदलता रास्ता दिखता ही रहेगा

जिससे मोहोब्बत है वो हमसफर ही तो चाहिए
वरना खुद को बहलाने के नए जरिए तो ये दिल लाता ही रहेगा

‘खालिस’ कुछ तो कर के बदले हालत तेरे,
कब तलक अश्कों को कागज़ पर बहाता ही रहेगा

मैं भूल चुका हूं उस शख्स को

मैं भूल चुका हूं उस शख्स को

जो कभी मेरे अंदर बस्ता था

थोड़ा भोला
थोड़ा नादान था वो
शराफत में डूबा हुआ
असलियत से अनजान था वो
जो कभी मिले तुम्हे वो तो मुझसे भी उसे मिलवाना
एक अरसा बीत गया है उसकी मासूमियत का एहसास लिए हुए

मुझे आज भी याद है कि वो बहुत खुश था
दुनिया की सारी खुशियां उसके पास थीं
पर तभी वक़्त ने करवट ली और सब कुछ बदल गया
अपनी आँखों के सामने उसने देखा 
अपनी हर ख़ुशी को हाथों से छूटते हुए
और मैं खड़ा बस देखता रहा उसे तिनका तिनका टूटते हुए

वो हारा नहीं था
बिखरा बेशक था वो लेकिन ज़िन्दगी से वो हर रोज लड़ता रहा
गिरता रहा
संभलता रहा
चलता रहा
आगे बढ़ता रहा
पर आखिर में वो थक गया
वो निराश था मैं जानता था क्योंकि
तनहा रातों में देखा था मैंने उसे
बहते अश्कों को पोछते हुए

बीच समंदर में फंसी थी उसकी कश्ती
न तो कोई साहिल उसके करीब था और
न ही उसके पास किसी का सहारा था
डूबना है उसने इस बात से भी वो बेखबर नहीं था
पर वापस जाने का रास्ता भी तो कहाँ उसे नज़र आ रहा था
वो वहीं बना रहा अपने अंजाम के लिए
और मैं दूर खड़ा देखता रहा उसे धीरे धीरे डूबते हुए

तस्वीर

एक तस्वीर मुझे तुम्हारी आज मिली
पुरानी सी, वक़्त की धूल में लिपटी हुई
कई यादें उसने जिंदा सी करदी
जो मेरे मन के संदूक में थी कहीं पड़ी हुई

उसमें सूरत तुम्हारी मुझे नज़र आती है
बेखौफ और बेफिक्र सी, लम्हे की खुशी से सजी हुई
और तुम्हारी आंखें.
भला क्या जिक्र करूं मैं उनका
चमक रही हैं वो मोतियों की तरह
और नूर से हैं वो भारी हुई

तुम्हारी रेशमी ज़ुल्फ़ें भी दिखाई दे रही हैं पर
वो तो कैद हैं एक धागे में
नजाने क्यों उनकी आज़ादी तुमने इसकदर उनसे छीनी हुई हैं
गालों पर तुम्हारे लाली नहीं है
जाने कहाँ वो खोयी हुई है

जो भी हो उस लम्हे तुम खुश तो हो
दिख रही हो तुम भी उस पल को जीती हुई
माना तस्वीर में तुम थोड़ी हैरान दिख रही हो पर
चहरे पर अधूरी सही एक मुस्कान दिख रही है अब छूटी हुई

रुको। आखिर मैं ये क्या कर रहा हूँ
क्यों में ये सब बातें एक तस्वीर से बयान कर रहा हूँ
शायद मैं ये सब तुमसे कहने से घबराता हूँ
या शायद मैं अब भी इस बात को तुमसे छिपता हूँ

या फिर मुझे तुमसे सीधा कुछ कहने की कभी जरूरत ही महसूस नहीं हुई
शायद क्योंकि मैं जवाब जनता था
हालातों को पहचानता था

या हो सकता है कि मैंने इसे ऐसे है चलने दिया यूँही
क्योंकि शायद अब तक मुझे तकदीर से अपनी वफाई की उम्मीद नहीं हुई

मेरे आंसू

काफी वक्त हो चला है कि मैं रोया नहीं हूं

के ये मेरे आंसूं पलकों तक आके मुकर जाया करते हैं

गम-ए-दास्तां सुनाता हूं इन्हें मैं हर रोज़ एक नई

पर ये आंसू हर बार अपने आप को नजाने किस कोने में छिपाया करते हैं

 

मैं बार बार फरियाद इनसे करता हूँ के

एक दिन तो ये भी पलकों के पर्दों को हटाकर बाहर आएं

सरकते हुए आंखों से मेरी मेरे गालों पर

अपने होने का निशां छोड़ जाएं

ये आए कभी इसकदर के संग अपने ये मेरे सारे गम भी बहा ले जाए

 

नजाने क्यों ये बाहर आने से इतना डरते हैं

हर बात पर ये नजाने क्यों इतना इतराया करते हैं

मैं हर दफा वफ़ा की उम्मीद इनसे करता हूँ

और ये बेगैरत हर बार बेवाई मुझसे किया  करते हैं

 

पर गलती इनकी भी नहीं है

शायद अब ये भी ऊब गए हैं मेरे हाल को देख कर

शायद अब ये भी मेरे उन अपनों से हो गए हैं

जो बीच राह में छोड़ गए मुझे लाचार समझ कर

 

यार फिर शायद बात कुछ और ही है

शायद अब ये बचे ही नहीं हैं

शायद ये बहुत पहले ही खत्म हो गए थे

तन्हा रातों में मेरी आँखों से बेवजह टपक टपक कर