Monthly Archives: October 2017

मैं भूल चुका हूं उस शख्स को

मैं भूल चुका हूं उस शख्स को

जो कभी मेरे अंदर बस्ता था

थोड़ा भोला
थोड़ा नादान था वो
शराफत में डूबा हुआ
असलियत से अनजान था वो
जो कभी मिले तुम्हे वो तो मुझसे भी उसे मिलवाना
एक अरसा बीत गया है उसकी मासूमियत का एहसास लिए हुए

मुझे आज भी याद है कि वो बहुत खुश था
दुनिया की सारी खुशियां उसके पास थीं
पर तभी वक़्त ने करवट ली और सब कुछ बदल गया
अपनी आँखों के सामने उसने देखा 
अपनी हर ख़ुशी को हाथों से छूटते हुए
और मैं खड़ा बस देखता रहा उसे तिनका तिनका टूटते हुए

वो हारा नहीं था
बिखरा बेशक था वो लेकिन ज़िन्दगी से वो हर रोज लड़ता रहा
गिरता रहा
संभलता रहा
चलता रहा
आगे बढ़ता रहा
पर आखिर में वो थक गया
वो निराश था मैं जानता था क्योंकि
तनहा रातों में देखा था मैंने उसे
बहते अश्कों को पोछते हुए

बीच समंदर में फंसी थी उसकी कश्ती
न तो कोई साहिल उसके करीब था और
न ही उसके पास किसी का सहारा था
डूबना है उसने इस बात से भी वो बेखबर नहीं था
पर वापस जाने का रास्ता भी तो कहाँ उसे नज़र आ रहा था
वो वहीं बना रहा अपने अंजाम के लिए
और मैं दूर खड़ा देखता रहा उसे धीरे धीरे डूबते हुए

Advertisements