Author Archives: vimal2naugain

मैं भूल चुका हूं उस शख्स को

मैं भूल चुका हूं उस शख्स को

जो कभी मेरे अंदर बस्ता था

थोड़ा भोला
थोड़ा नादान था वो
शराफत में डूबा हुआ
असलियत से अनजान था वो
जो कभी मिले तुम्हे वो तो मुझसे भी उसे मिलवाना
एक अरसा बीत गया है उसकी मासूमियत का एहसास लिए हुए

मुझे आज भी याद है कि वो बहुत खुश था
दुनिया की सारी खुशियां उसके पास थीं
पर तभी वक़्त ने करवट ली और सब कुछ बदल गया
अपनी आँखों के सामने उसने देखा 
अपनी हर ख़ुशी को हाथों से छूटते हुए
और मैं खड़ा बस देखता रहा उसे तिनका तिनका टूटते हुए

वो हारा नहीं था
बिखरा बेशक था वो लेकिन ज़िन्दगी से वो हर रोज लड़ता रहा
गिरता रहा
संभलता रहा
चलता रहा
आगे बढ़ता रहा
पर आखिर में वो थक गया
वो निराश था मैं जानता था क्योंकि
तनहा रातों में देखा था मैंने उसे
बहते अश्कों को पोछते हुए

बीच समंदर में फंसी थी उसकी कश्ती
न तो कोई साहिल उसके करीब था और
न ही उसके पास किसी का सहारा था
डूबना है उसने इस बात से भी वो बेखबर नहीं था
पर वापस जाने का रास्ता भी तो कहाँ उसे नज़र आ रहा था
वो वहीं बना रहा अपने अंजाम के लिए
और मैं दूर खड़ा देखता रहा उसे धीरे धीरे डूबते हुए

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तस्वीर

एक तस्वीर मुझे तुम्हारी आज मिली
पुरानी सी, वक़्त की धूल में लिपटी हुई
कई यादें उसने जिंदा सी करदी
जो मेरे मन के संदूक में थी कहीं पड़ी हुई

उसमें सूरत तुम्हारी मुझे नज़र आती है
बेखौफ और बेफिक्र सी, लम्हे की खुशी से सजी हुई
और तुम्हारी आंखें.
भला क्या जिक्र करूं मैं उनका
चमक रही हैं वो मोतियों की तरह
और नूर से हैं वो भारी हुई

तुम्हारी रेशमी ज़ुल्फ़ें भी दिखाई दे रही हैं पर
वो तो कैद हैं एक धागे में
नजाने क्यों उनकी आज़ादी तुमने इसकदर उनसे छीनी हुई हैं
गालों पर तुम्हारे लाली नहीं है
जाने कहाँ वो खोयी हुई है

जो भी हो उस लम्हे तुम खुश तो हो
दिख रही हो तुम भी उस पल को जीती हुई
माना तस्वीर में तुम थोड़ी हैरान दिख रही हो पर
चहरे पर अधूरी सही एक मुस्कान दिख रही है अब छूटी हुई

रुको। आखिर मैं ये क्या कर रहा हूँ
क्यों में ये सब बातें एक तस्वीर से बयान कर रहा हूँ
शायद मैं ये सब तुमसे कहने से घबराता हूँ
या शायद मैं अब भी इस बात को तुमसे छिपता हूँ

या फिर मुझे तुमसे सीधा कुछ कहने की कभी जरूरत ही महसूस नहीं हुई
शायद क्योंकि मैं जवाब जनता था
हालातों को पहचानता था

या हो सकता है कि मैंने इसे ऐसे है चलने दिया यूँही
क्योंकि शायद अब तक मुझे तकदीर से अपनी वफाई की उम्मीद नहीं हुई

मेरे आंसू

काफी वक्त हो चला है कि मैं रोया नहीं हूं

के ये मेरे आंसूं पलकों तक आके मुकर जाया करते हैं

गम-ए-दास्तां सुनाता हूं इन्हें मैं हर रोज़ एक नई

पर ये आंसू हर बार अपने आप को नजाने किस कोने में छिपाया करते हैं

 

मैं बार बार फरियाद इनसे करता हूँ के

एक दिन तो ये भी पलकों के पर्दों को हटाकर बाहर आएं

सरकते हुए आंखों से मेरी मेरे गालों पर

अपने होने का निशां छोड़ जाएं

ये आए कभी इसकदर के संग अपने ये मेरे सारे गम भी बहा ले जाए

 

नजाने क्यों ये बाहर आने से इतना डरते हैं

हर बात पर ये नजाने क्यों इतना इतराया करते हैं

मैं हर दफा वफ़ा की उम्मीद इनसे करता हूँ

और ये बेगैरत हर बार बेवाई मुझसे किया  करते हैं

 

पर गलती इनकी भी नहीं है

शायद अब ये भी ऊब गए हैं मेरे हाल को देख कर

शायद अब ये भी मेरे उन अपनों से हो गए हैं

जो बीच राह में छोड़ गए मुझे लाचार समझ कर

 

यार फिर शायद बात कुछ और ही है

शायद अब ये बचे ही नहीं हैं

शायद ये बहुत पहले ही खत्म हो गए थे

तन्हा रातों में मेरी आँखों से बेवजह टपक टपक कर

​मेरे महबूब

मेरे महबूब चल आ आज हम खुद को खुद से ही जुदा करते हैं

आजा हम दोनों आज एक दूसरे का किरदार अदा करते हैं

 

के तुम कहो आज की तुम्हे मुझसे प्यार है

और मैं कहूँ के जवाब मेरा अब भी इंकार है

 

के तुम कहो की तुम बैठी हो आज भी मेरे इंतज़ार में

और मैं कहूँ की क्या रखा है इस बेमतलब के प्यार में

 

के तुम कहो की तुम्हे आज भी वो गुज़रे लम्हें, वो बीते पल, वो भूली बिसरी बातें सारी हूबहू याद है

और मैं कहूँ के ये महज खयाल है तुम्हारा, बातें ये सारी बेबुनियाद है

 

के तुम कहो के मेरी याद में कलम तुम्हारी कोरे कागजों को नीली सियाही से भर देती है

और मैं झाड़ लूं पल्ला इस बात से ये कह कर के, मत करो ये आशिक़ी मुझसे ये ही है जो आखित में सबसे ज्यादा दर्द देती है

 

के तुम कहो की मुझे संग किसी और के देख कभी-कभी दिल तुम्हारा भी जलता है

और मैं कहूँ के क्यों ये बेमतलबी खयाल बार बार तुम्हारे ज़हन में पलता है

 

के तुम कहो की आज सबकुछ भूल कर ये दोस्ती की दीवार हम लांग देते हैं

और मैं कहूँ नहीं, अपने इस रिश्ते को हम दोस्ती पर ही थाम देते हैं

 

मेरे महबूब काश, काश के ऐसा दिन भी कभी होता

तुम जीती पल भर के लिए ज़िंदगी मेरी

और पल भर के लिए मैं तुमसा होता

पर क्या करूँ ये किस्मत पर चलती नहीं मेरी शरतें हैं

मेरे सारे दिन इन बेकार के खयालों को सोचने में ही गुज़रते हैं

शायरी

जन्नतें नसीब हैं जो तू मेरे करीब है,

हासिल एक दूसरे को कर लेना ही तो प्यार नहीं कहलाता है.

जो चंद लम्हे हैं पास अपने, जी लेंगे हम इन्ही को मुक्कदर समझ कर,

ताउम्र साथ निभाना ही तो ऐतबार नहीं कहलाता है.

तो क्या हुआ जो राहें है जुदा अपनी, हम मंज़िल को एक करलेंगे

बुझाकर शामाएँ अपनी रात की चांदनी के लिए सूरज भी तो अपना वादा निभाता है क्योंकि

हर पल हाथों में हाथ डालकर साथ खड़े रहना ही तो साथ नही कहलाता है

​क्या कभी देखा है तुमने

क्या कभी देखा है तुमने

मेरी इन सुर्ख निगाहों में

कबसे ढूंढें है ये तेरा जिक्र

इन भटकती राहों में

 

कबसे बिछड़े हुए हैं ये दिल अपने

कबसे सोया नहीं हूं मैं

तेरी इन जुल्फ की छाओं में

पर महक अब भी तेरे हुस्न की आती है मुझे

बसी है ये भी कहीं अब तक इन फ़िज़ाओं में

 

मैं कोई भूला हुआ सा ख़याल हूँ तेरा

जो तुझे कभी याद आता नहीं

पर मुझे एहसास होता है अब तक तेरा

अपनी इन बाँहों में

 

तेरी मुस्कुराहटों पर झूमे है ये मन मेरा

है कुछ तो ख़ास बसा तेरी इन अदाओं में

कुछ तो मजबूरी-ए-हालात ने हमको संग होने ना दिया

वरना क्या बात ना थी मेरी दुआओं में

वो लम्हा

मैं बेखुदी के लिए शराब नहीं पीता हूँ.

मैं पीता हूँ लम्हों का एहसास लेने के लिए.

वो लम्हा जिसमे पल भर के लिए ही सही,

मैं तुम्हारे पास होता हूँ.

 

वो लम्हा जब तुम सारी परेशानियां भूल कर,

यूँही मेरे पास आकर लेट जाती हो.

और मैं धीरे से अपने बिखरते जज़बातों को थाम लेता हूँ.

 

वो लम्हा जब तुम्हारी हौले से चलती साँसों की आवाज़ भी,

मेरे कानों तक आती है के,

तुम्हे इतना करीब मैं खुद के पाता हूँ.

 

वो लम्हा जब तुम्हारी बेपरवाह सिसकियों को भी मैं,

तुम्हारी नादानी मान जाता हूँ.

 

वो लम्हा जब तुम्हारी पल पल बढ़ती दिल की धड़कनों को,

मैं यूँही पहचान लेता हूँ.

 

वो लम्हा जब तुम कसकर मेरा हाथ थाम लेती हो,

और मैं धीरे से उनका मिज़ाज जान लेता हूँ.

 

वो लम्हा जब तुम कुछ कहती नहीं हो,

फिर भी मैं तुम्हारे सारे खयाल सुन लेता हूँ.

 

वो लम्हा जब बेफिक्री से बिखरती तुम्हारी ज़ुल्फ़ों को

मैं तुम्हारे जाने बिना ही थाम लेता हूँ.

 

वो लम्हा जब न तुम्हे पाने की ख्वाइश रहती है,

ना ही तुम्हे खोने का डर होता है.

और उस लम्हे में मैं तुम्हे अपना मान लेता हूँ.

 

वो लम्हा जब न हकीकत ना ख़्वाब की मुझे परवाह रहती है

बस एक अलग जहांन में मैं जीता हूँ.

 

वो लम्हा जब थम जाता है ये वक़्त भी मेरे लिए,

और जिस लम्हे का मैं बार बार इंतज़ार करता हूँ.

मैं जीता नहीं जिंदगी बेवजह जीने के लिए,

इन कुछ लम्हों से ही मैं चंद खुशियां अपने लिए छान लेता हूँ.

मैं कभी बेखुदी के लिए शराब नहीं पीता हूँ.