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शायरी

जन्नतें नसीब हैं जो तू मेरे करीब है,

हासिल एक दूसरे को कर लेना ही तो प्यार नहीं कहलाता है.

जो चंद लम्हे हैं पास अपने, जी लेंगे हम इन्ही को मुक्कदर समझ कर,

ताउम्र साथ निभाना ही तो ऐतबार नहीं कहलाता है.

तो क्या हुआ जो राहें है जुदा अपनी, हम मंज़िल को एक करलेंगे

बुझाकर शामाएँ अपनी रात की चांदनी के लिए सूरज भी तो अपना वादा निभाता है क्योंकि

हर पल हाथों में हाथ डालकर साथ खड़े रहना ही तो साथ नही कहलाता है

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​क्या कभी देखा है तुमने

क्या कभी देखा है तुमने

मेरी इन सुर्ख निगाहों में

कबसे ढूंढें है ये तेरा जिक्र

इन भटकती राहों में

 

कबसे बिछड़े हुए हैं ये दिल अपने

कबसे सोया नहीं हूं मैं

तेरी इन जुल्फ की छाओं में

पर महक अब भी तेरे हुस्न की आती है मुझे

बसी है ये भी कहीं अब तक इन फ़िज़ाओं में

 

मैं कोई भूला हुआ सा ख़याल हूँ तेरा

जो तुझे कभी याद आता नहीं

पर मुझे एहसास होता है अब तक तेरा

अपनी इन बाँहों में

 

तेरी मुस्कुराहटों पर झूमे है ये मन मेरा

है कुछ तो ख़ास बसा तेरी इन अदाओं में

कुछ तो मजबूरी-ए-हालात ने हमको संग होने ना दिया

वरना क्या बात ना थी मेरी दुआओं में

शायरी

ये इश्क़ बहुत कीमती है तू यूँ ही इसे ज़ाया ना कर

हर जगह यूँही दिल से दिल लगाया ना कर

जो लिखा है खुदा ने नसीब में तेरे,

वो तुझे जरूर मिलेगा एक दिन

यूँ ही बेवजह तू अपनी क़िस्मत पर ये हज़ारों सवाल उठाया ना कर

मैं लिखना तबसे भूल चुका हूँ

दिल की बोली ही मेरी लिखाई थी,

मैं बेफिकरा सा शायर था.

नजाने कब नजरे मिली

कब प्यार हुआ

मैं लिखना तबसे भूल गया हूँ.
अब न इश्क़ रहा है अल्फ़ाज़ों में

सब सिमट गया है जज़बातों में

चैन नहीं रहता है दिन में

नींद नहीं है रातों में


चेहरा उसका दिखने लगा हैं

जब भी आंखें मूँदता हूँ.

अपनी लिखी हर बात में अब तो

मैं ज़िक्र उसी का ढूंढता हूँ.

जबसे नजरे मिली,

जबसे प्यार हुआ,

मैं लिखना तबसे भूल चुका हूँ.
अब कलम हाथ से छोड़ चुका हूँ

राह उसतक मोड़ चुका हूँ

होश नहीं रहता है खुदका

खयालों में उसके मैं खो चुका हूँ.
सच है वो या है कलपना मेरी
ये बात समझ मे आती नहीं है
नजाने कैसे ख़यालात ऐसे मैं मन में अपने बो चुका हूँ.

जबसे नजारे मिली,

जबसे प्यार हुआ है,

मैं लिखना तबसे भूल गया हूँ