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शायरी

ये इश्क़ बहुत कीमती है तू यूँ ही इसे ज़ाया ना कर

हर जगह यूँही दिल से दिल लगाया ना कर

जो लिखा है खुदा ने नसीब में तेरे,

वो तुझे जरूर मिलेगा एक दिन

यूँ ही बेवजह तू अपनी क़िस्मत पर ये हज़ारों सवाल उठाया ना कर

बारिश की बूंदें

मेरी खिड़की पर पड़ी ये बारिश की बूंदें

कहती है मुझसे ढेरों बातें

जो सिर्फ मुझको ही मालूम हैं
इन बातों को न कोई समझ सकता है

न कोई जान सकता है

पर आज कल नजाने क्यों

ये मुझसे ही महरूम हैं
शायद मेरी खामोशी से ये भी नाराज हैं

शायद मेरे हाल से ये अभी तक अनजान हैं
ये जो चुप्पी मैंने साधी हुई है

शायद यही वजह है जो ये भी अब

सिसक सिसक कर जाने लगी हैं

मेरी हर फरियाद को ये बिन सुने ही ठुकराने लगी हैं
मैं कहता इनसे राह जाता हूँ के

चंद लम्हे मुझ संग रुकने की ये वजह कोई ढूंढे

पर पल भर में हवा हो जाती हैं

मेरी खिड़की पर पड़ी ये बारिश की बूंदें

मैं ये तुमसे कह नहीं पाता

तुम्हारे हर सवाल का जवाब है मेरे पास

दिल करता है के आज तुमको बतादूँ

पर नजाने क्यों हर बार

मैं ये तुमसे कह नहीं पाता
दूरियाँ पसंद नहीं हैं तुम्हे

दूरियाँ गवारी मुझको भी नहीं हैं

इन दूरियों की वजह सोचता हूँ बता दूं तुम्हे

पर नजाने क्यों हर बार

मैं ये तुमसे कह नहीं पता

मेरी खामोशी, मेरी खोयी मुस्कुराहट

जनता हूँ तुमको भी खूब खलती है

मेरी इस गम-ए-हयात की दास्तां सोचता हूँ तुमको बतादूँ

पर नजाने क्यों हर बार

मैं ये तुमसे कह नहीं पाता

तुम्हारी आँखों के पीछे छिपे

बूंद भर जो आँसू हैं, देख उन्हें मैं 

कितना मायूस होता हूँ

सोचता हूँ तुमको बात दूँ

पर नजाने क्यों हर बार

मैं ये तुमसे कह नहीं पाता

मैं कभी कह नहीं पाता वो हजरों अनकही बातें

जो दिल मे मैने अपने छुपा कर रखी है

ये सब वो बातें हैं जिनका ज़ुबान पर आना मुनासिब नहीं है 

और अगर कभी ये ज़बान पर आ भी जाए तो

नजाने क्यों हर बार

मैं ये तुमसे कह नहीं पाता

मैं लिखना तबसे भूल चुका हूँ

दिल की बोली ही मेरी लिखाई थी,

मैं बेफिकरा सा शायर था.

नजाने कब नजरे मिली

कब प्यार हुआ

मैं लिखना तबसे भूल गया हूँ.
अब न इश्क़ रहा है अल्फ़ाज़ों में

सब सिमट गया है जज़बातों में

चैन नहीं रहता है दिन में

नींद नहीं है रातों में


चेहरा उसका दिखने लगा हैं

जब भी आंखें मूँदता हूँ.

अपनी लिखी हर बात में अब तो

मैं ज़िक्र उसी का ढूंढता हूँ.

जबसे नजरे मिली,

जबसे प्यार हुआ,

मैं लिखना तबसे भूल चुका हूँ.
अब कलम हाथ से छोड़ चुका हूँ

राह उसतक मोड़ चुका हूँ

होश नहीं रहता है खुदका

खयालों में उसके मैं खो चुका हूँ.
सच है वो या है कलपना मेरी
ये बात समझ मे आती नहीं है
नजाने कैसे ख़यालात ऐसे मैं मन में अपने बो चुका हूँ.

जबसे नजारे मिली,

जबसे प्यार हुआ है,

मैं लिखना तबसे भूल गया हूँ