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शायद सब भूल चुके हैं

हर कोई बस जिस्म ढूंढे हैं यहां
जज्बातों को समझना शायद सब भूल चुके हैं

साथ होता है हर कोई यहां
साथ निभाना शायद सब भूल चुके हैं

रुकता नहीं कोई पल दो पल किसी के लिए यहां
सालों साल किसी का मुंतज़िर होना शायद सब भूल चुके हैं

वे खालिस कैसी दुनिया है ये तेरी जहाँ
लोग दिल बहलाना तो जानतें हैं
पर दिल लगाना शायद भूल चुके हैं

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शायरी

ये इश्क़ बहुत कीमती है तू यूँ ही इसे ज़ाया ना कर

हर जगह यूँही दिल से दिल लगाया ना कर

जो लिखा है खुदा ने नसीब में तेरे,

वो तुझे जरूर मिलेगा एक दिन

यूँ ही बेवजह तू अपनी क़िस्मत पर ये हज़ारों सवाल उठाया ना कर

मैं लिखना तबसे भूल चुका हूँ

दिल की बोली ही मेरी लिखाई थी,

मैं बेफिकरा सा शायर था.

नजाने कब नजरे मिली

कब प्यार हुआ

मैं लिखना तबसे भूल गया हूँ.
अब न इश्क़ रहा है अल्फ़ाज़ों में

सब सिमट गया है जज़बातों में

चैन नहीं रहता है दिन में

नींद नहीं है रातों में


चेहरा उसका दिखने लगा हैं

जब भी आंखें मूँदता हूँ.

अपनी लिखी हर बात में अब तो

मैं ज़िक्र उसी का ढूंढता हूँ.

जबसे नजरे मिली,

जबसे प्यार हुआ,

मैं लिखना तबसे भूल चुका हूँ.
अब कलम हाथ से छोड़ चुका हूँ

राह उसतक मोड़ चुका हूँ

होश नहीं रहता है खुदका

खयालों में उसके मैं खो चुका हूँ.
सच है वो या है कलपना मेरी
ये बात समझ मे आती नहीं है
नजाने कैसे ख़यालात ऐसे मैं मन में अपने बो चुका हूँ.

जबसे नजारे मिली,

जबसे प्यार हुआ है,

मैं लिखना तबसे भूल गया हूँ