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जिक्र

क्या करूँ मैं ज़िक्र उसका
वो जहाँ से अलग है सबसे जुदा है
वो यास्मीन के फूलों सी है
सफेद, पाक नाजुक सी
वो दश्त में भी बहार कर देें
फ़िज़ाओं में भी अपनी महक भर दें
उसका नूर अंधेरों को भी रोशन कर दें
नैन ऐसे की किसी को भी दीवाना कर दें
बहुत ही खास है वो दिल अज़ीज़ है वो
भला ऐसी शख्सियत का कैसे मैं ज़िक्र कर दूं

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वो ऐसी नहीं है

जली थी लौ इश्क़ की मेरे दिल मे
कसूर इसमें उसका नहीं है
वो मेरे पास मैं दूर हूँ उससे ये किस्मत है मेरी
बेकदर है वो माना पर बेवफा नहीं है

होगी वजहें उसकी भी कईं
नज़रअंदाजी उसकी ये यूँही नहीं है
सुना है हमनवा हैं उसके बहुत
मेरी हमनवाई की शायद उसे जरूरत नहीं है

भूल तो जाता मैं कबका उसे
पर ज़हन से दूर मेरे वो कभी जाती ही नहीं है
फिर भी बहका देता हूँ मैं ये कहकर अपने नादान दिल को
के चाहता है वो मेरी जरूरत नहीं है

कभी तो…

कुछ यूं गर किस्मत हो जाता कभी तो
मैं फकत तेरा हो जाता कभी तो
मैं तेरे पेशानी (माथा) पर हर पल बिखरती हुई, उलझी जुल्फों को सुलझाता
और तेरी बाहों में बैठे हुए शायद मैं हाल-ए-दिल कह पाता कभी तो

गर मुझे मौका मिल पाता कभी तो
मैं दिल के हर सफे (कागज़) पर नाम तेरा लिख पाता कभी तो
जिसे सुनकर तेरी आँखों में भी अश्क भर आते
अपनी लिखी वो अनसुनी ग़ज़ल मैं तुझे सुनता कभी तो

गर खुदा-ए-रहमत ऐसा हो जाता कभी तो
मेरा ये ख़्वाब सच हो जाता कभी तो
मैं उम्र बिता देता खिदमत में उसकी
गर मेरा हमनवा मेरा हमसफर बन जाता कभी तो

सिगरेट

सिगरेट सी बन गई हो तुम
हर कश में मेरी जान लेती जाती हो
दूर रहना तुमसे मुनासिब नहीं लगता
पास रहने पर मौत की वजह बन जाती हो तुम

हर पल तुम्हे याद करना शौक नहीं है मेरा
अक्सर ज़हन में रहते हुए आदत मेरी बन जाती हो तुम
गर फकत मैं कभी भूलना चाहूँ भी जो तुम्हे
तो तनहाई के आलम में याद बनकर आ जाती हो तुम

मैं माचिस सा जलता हूँ हर बार
शमाएँ तुम्हारी जलाने के लिए
और किसी जलती सिगरेट की तरह किसी और के होंठों पर चली जाती हो तुम
गर कभी मैं तुम तक आने की कोशिश भी अगर करूं तो
बनकर धुंआ सिगरेट का पल भर उड़ जाती हो तुम

कई हर्फ़ ढूंढता हूँ मैं

कई हर्फ़ (Words) ढूंढे है दिल मेरा

हर्फ़ जो दिल-ए-तसल्ली दें
हर्फ़ जो सारी बातें कहें

हर्फ़ जो अल्फ़ाज़ बने
हर्फ़ जो आवाज़ बने

कई हर्फ़ ढूंढे है दिल मेरा

हर्फ़ जो खामोशियाँ कहें
हर्फ़ जो आंसू बनकर बाहें

हर्फ़ जो ना लाचार हों
हर्फ़ जो दिल से निकलने को बेकरार हों

कई हर्फ़ ढूंढे है दिल मेरा

हर्फ़ जो शायरी बने
हर्फ़ जो दिल दुखी कहें

हर्फ़ जो इश्क़ का कलमा पढ़ें
हर्फ़ जो आके तुझसे जुड़ें

कई हर्फ़ ढूंढे है दिल मेरा

हर्फ़ जो तुमको बयां करें
हर्फ़ जो तुमपर आके मरें

हर्फ़ जो बात दिलों की जानते हों
हर्फ़ जो तुम्हें पहचानते हों

हर्फ़ जो कह दें हाल-ए-दिल की बात जो ज़ुबाँ कभी कह पाई नहीं
हर्फ़ जो काबू में मेरे कभी आए ही नहीं

कुछ ऐसे ही हर्फ़ ढूंढता हूं मैं

शायद सब भूल चुके हैं

हर कोई बस जिस्म ढूंढे हैं यहां
जज्बातों को समझना शायद सब भूल चुके हैं

साथ होता है हर कोई यहां
साथ निभाना शायद सब भूल चुके हैं

रुकता नहीं कोई पल दो पल किसी के लिए यहां
सालों साल किसी का मुंतज़िर होना शायद सब भूल चुके हैं

वे खालिस कैसी दुनिया है ये तेरी जहाँ
लोग दिल बहलाना तो जानतें हैं
पर दिल लगाना शायद भूल चुके हैं

जो बीत गया वो पल ही तो वापस चाहिए

आने वाला लम्हा तो आता ही रहेगा

जो छोड़ आया हूँ घर मैं अपना, वो घर ही तो वापस चाहिए
नया मकान तो कई बार खरीदा जाता ही रहेगा

जिस मंज़िल से मुंह मोड़ा मैंने मजबूरी-ए-हालात में, वो मंज़िल ही तो वापस चाहिए
नई मंज़िलें तो हर बदलता रास्ता दिखता ही रहेगा

जिससे मोहोब्बत है वो हमसफर ही तो चाहिए
वरना खुद को बहलाने के नए जरिए तो ये दिल लाता ही रहेगा

‘खालिस’ कुछ तो कर के बदले हालत तेरे,
कब तलक अश्कों को कागज़ पर बहाता ही रहेगा