​कुछ मत कहो अब तुम

कुछ मत कहो अब तुम

बस यूँ ही आंखों में आंखे डाले रहो और

मुझे दिल की तुम्हारी हर बात को पढ़ने दो

 

कुछ मत कहो अब तुम

बस यूँ ही ख़ामोश रहो और

मुझे इस लम्हे को खुद में कैद करने दो

 

कुछ मत कहो अब तुम

बस यूँ ही हवा में फैलती तुम्हारी इस महक को

मुझे अपनी इन साँसों में भरने दो

 

कुछ मत कहो अब तुम

बस यूँ ही हाथों में हाथ डाले रहो

मुझे एक आखरी एहसास तुम्हे छूने का करने दो

 

कुछ मत कहो अब तुम

बस यूँ ही बेझिझक मुस्कुराती रहो और

मुझे भी अपने जज़बातों को आज़ाद करने दो

 

कुछ मत कहो अब तुम

बस यूँ ही चंद घड़ियां और मेरे नज़दीक लेटी रहो

मुझे एक आखरी दफा ही सही इकरार-ए-इश्क़ तुमसे करने दो

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कोई मुझसा उस पार

पलकें उठाकर जब भी मैं देखता हूँ,

एक भूली बिसरी सी सूरत दिखाई देती है.

कोई तो है उसपार मुझसा ही क्योंकि,

सूरत में मुझे उसकी कुछ अपनी सी,

मायूसी दिखाई देती है.

 

बेजान पड़ी आंखे उसकी,

कईं जगी रातों की दास्तां मुझसे कह देती है.

उसकी चुप ख़ामोशी में भी मुझे

दर्द भरी चीखें सुनाई देती है.

 

चेहरे पर पड़ी उसकी,

तमाम छोटी छोटी झुर्रियां,

उसके हालात बयान कर देती है.

बेबस पड़ी पलकें उसकी शायद,

हर रात रो रो कर जान देती है.

 

हर रोज़ मिलते हैं हम एक दूसरे से,

पर ज़बान हम दोनों की हमें कुछ कहने नहीं देती है.

पलकें उठाकर जब भी मैं देखता हूं उसको

आईने में मुझे हर बार सूरत अपनी दिखाई देती है.

शायरी

ये इश्क़ बहुत कीमती है तू यूँ ही इसे ज़ाया ना कर

हर जगह यूँही दिल से दिल लगाया ना कर

जो लिखा है खुदा ने नसीब में तेरे,

वो तुझे जरूर मिलेगा एक दिन

यूँ ही बेवजह तू अपनी क़िस्मत पर ये हज़ारों सवाल उठाया ना कर

बारिश की बूंदें

मेरी खिड़की पर पड़ी ये बारिश की बूंदें

कहती है मुझसे ढेरों बातें

जो सिर्फ मुझको ही मालूम हैं
इन बातों को न कोई समझ सकता है

न कोई जान सकता है

पर आज कल नजाने क्यों

ये मुझसे ही महरूम हैं
शायद मेरी खामोशी से ये भी नाराज हैं

शायद मेरे हाल से ये अभी तक अनजान हैं
ये जो चुप्पी मैंने साधी हुई है

शायद यही वजह है जो ये भी अब

सिसक सिसक कर जाने लगी हैं

मेरी हर फरियाद को ये बिन सुने ही ठुकराने लगी हैं
मैं कहता इनसे राह जाता हूँ के

चंद लम्हे मुझ संग रुकने की ये वजह कोई ढूंढे

पर पल भर में हवा हो जाती हैं

मेरी खिड़की पर पड़ी ये बारिश की बूंदें

शायरी

बीच समंदर में डूबती कश्ती को,

बस एक किनारा चाहिए.

लड़खड़ाते हुए कदमों को ,

बस किसी अपने का सहारा चाहिए.

यूँ ही नहीं लिखता है हर कोई शायरी इश्क़ पर,

अपने जज़बातों को कागज़ पर पिरोहने को

इस दिल को भी तो कोई बहाना चाहिए.

मैं ये तुमसे कह नहीं पाता

तुम्हारे हर सवाल का जवाब है मेरे पास

दिल करता है के आज तुमको बतादूँ

पर नजाने क्यों हर बार

मैं ये तुमसे कह नहीं पाता
दूरियाँ पसंद नहीं हैं तुम्हे

दूरियाँ गवारी मुझको भी नहीं हैं

इन दूरियों की वजह सोचता हूँ बता दूं तुम्हे

पर नजाने क्यों हर बार

मैं ये तुमसे कह नहीं पता

मेरी खामोशी, मेरी खोयी मुस्कुराहट

जनता हूँ तुमको भी खूब खलती है

मेरी इस गम-ए-हयात की दास्तां सोचता हूँ तुमको बतादूँ

पर नजाने क्यों हर बार

मैं ये तुमसे कह नहीं पाता

तुम्हारी आँखों के पीछे छिपे

बूंद भर जो आँसू हैं, देख उन्हें मैं 

कितना मायूस होता हूँ

सोचता हूँ तुमको बात दूँ

पर नजाने क्यों हर बार

मैं ये तुमसे कह नहीं पाता

मैं कभी कह नहीं पाता वो हजरों अनकही बातें

जो दिल मे मैने अपने छुपा कर रखी है

ये सब वो बातें हैं जिनका ज़ुबान पर आना मुनासिब नहीं है 

और अगर कभी ये ज़बान पर आ भी जाए तो

नजाने क्यों हर बार

मैं ये तुमसे कह नहीं पाता

मैंने दिल में ही रहने दिया

हसरतें जो दिल में थी,

मैंने उन्हें दिल में ही रहने दिया.

न कभी मैंने उससे कुछ कहा,

न कभी उसे कुछ समझने दिया.

 

चाहतें जो दिल में थी,

मैंने उन्हें दिल में ही रहने दिया.

पहनाकर लिबाज़ दोस्ती का,

हर बार अपनी चाहतों को,

पेश सामने उसके कर दिया.।


ख्वाइशें जो दिल में थी,

मैंने उन्हें दिल में ही रहने दिया.

जीत रहा था खवाबों में मैं बाज़ी सारी इश्क़ की,

लेकिन हकीकत ने मुझे आईना दिखा दिया.

 

थे जितने भी नापाक इरादे मेरे,

मैंने उन्हें दिल में ही रहने दिया,

हाल-ए-दिल मेरा अपनी ज़बान को कभी न उससे कहने दिया.

एकतरफ़ा ही सही इस इश्क़ पर हक़ पूरा मेरा है,

झूठा ही सही ये दिलासा मेरा,

इसी ने मेरे बिखरते दिल को हौसला दिया.