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बारिश की बूंदें

मेरी खिड़की पर पड़ी ये बारिश की बूंदें

कहती है मुझसे ढेरों बातें

जो सिर्फ मुझको ही मालूम हैं
इन बातों को न कोई समझ सकता है

न कोई जान सकता है

पर आज कल नजाने क्यों

ये मुझसे ही महरूम हैं
शायद मेरी खामोशी से ये भी नाराज हैं

शायद मेरे हाल से ये अभी तक अनजान हैं
ये जो चुप्पी मैंने साधी हुई है

शायद यही वजह है जो ये भी अब

सिसक सिसक कर जाने लगी हैं

मेरी हर फरियाद को ये बिन सुने ही ठुकराने लगी हैं
मैं कहता इनसे राह जाता हूँ के

चंद लम्हे मुझ संग रुकने की ये वजह कोई ढूंढे

पर पल भर में हवा हो जाती हैं

मेरी खिड़की पर पड़ी ये बारिश की बूंदें

पल भर

पल भर और सही,

अपना हाथ थोड़ी देर और थमने दो

एहसास मेरी रूह को

अबतक तुम्हारा हुआ नहीं.
पल भर और सही

मुझे तेरी इन सागर सी गहरी

आंखों में झांकने दो,

इनमे मुझे अपना दीदार अबतक हुआ नहीं.
पल भर और सही

अपने गालों पर तुम्हारी इन बिखरी जुल्फों को

थोड़ी देर और ठहरने दो,

तुम्हारी इस बेफिक्र सूरत को

अभीतक जी भरके मैंने देखा नहीं.
पल भर और सही

तू थोड़ा और ठहरजा, आखरी मुलाकात समझ कर ही सही

के मैंने कैद इस लम्हे को अपने दिल में करलूँ.

क्योंकि आने वाला वक़्त हमारा नहीं है

पागल दिल

लाख दफा समझया इस पागल दिल को,

के नाजा गली में उसकी तू यूँ बेईज्जत होने.

जिन रास्तों की मंजिल नहीं,

उन रास्तों का सफर मुनासिफ नहीं.

बारिश की बूंदे

ये ठंडी हवाएं
ये बारिश की बूंदे

जब भी मुझतक आती हैं

कई पुरानी यादों को ये फिर से दिल मे जगती है
किसी दिल-ए-खास सी ये

आकर मेरे गालों को चूमती है

हम दोनों के इस मिलन पर

ये मद्धम हवाएं भी झूमती है
मैं भी सब कुछ भूल कर,

बाँहों को अपनी खोल कर

एहसास इनका कर लेता हूँ

इन बूंदों के बहाने ही सही

मैं फिर से इस खाली दिल में

चंद यादों को कैद कर लेता हूँ.

मैं भी कई कही अनकही बाते इसको बताता हूँ

बस इसी उम्मीद में की

एक दिन तो ये उसतक इन बातो को लेजाएगी

क्या है हाल-ए-दिल मेरा

ये उसको भी बताएगी
पर ये भी बड़ी चालाक हैं

पल भर में गायब हो जाती है

इंद्रधनुष की आड़ में

मुझपर ये मुस्कुराती है

जाते-जाते दिल में मेरे

ये मीठा दर्द ये दे जाती है
ये ठंडी हवाएं 

ये बारिश की बूंदे

मुझको बड़ा सताती हैं

मैं लिखना तबसे भूल चुका हूँ

दिल की बोली ही मेरी लिखाई थी,

मैं बेफिकरा सा शायर था.

नजाने कब नजरे मिली

कब प्यार हुआ

मैं लिखना तबसे भूल गया हूँ.
अब न इश्क़ रहा है अल्फ़ाज़ों में

सब सिमट गया है जज़बातों में

चैन नहीं रहता है दिन में

नींद नहीं है रातों में


चेहरा उसका दिखने लगा हैं

जब भी आंखें मूँदता हूँ.

अपनी लिखी हर बात में अब तो

मैं ज़िक्र उसी का ढूंढता हूँ.

जबसे नजरे मिली,

जबसे प्यार हुआ,

मैं लिखना तबसे भूल चुका हूँ.
अब कलम हाथ से छोड़ चुका हूँ

राह उसतक मोड़ चुका हूँ

होश नहीं रहता है खुदका

खयालों में उसके मैं खो चुका हूँ.
सच है वो या है कलपना मेरी
ये बात समझ मे आती नहीं है
नजाने कैसे ख़यालात ऐसे मैं मन में अपने बो चुका हूँ.

जबसे नजारे मिली,

जबसे प्यार हुआ है,

मैं लिखना तबसे भूल गया हूँ

चल चले एक नए सफर पर

चल चले एक नए सफर पर, बांधकर पुरानी यादों के गठरी,
ढूंढने अंधेरे रास्तों पर 

उम्मीदों की नई रौशनी।


तो क्या फर्क पड़ता है अगर मंज़िल ना भी मिले तो

हसीन रास्तो पर हम चलते चलेंगे

गमो के समंदर में डूबके भी

खुशी का किनारा हम ढूंढ ही लेंगे।

जिंदगी की इस कशमकश में खुद से बेखबर हम हो चले थे

ढूंढने फिर से अपने आप को

चल चले एक नए सफर पर