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बारिश की बूंदें

मेरी खिड़की पर पड़ी ये बारिश की बूंदें

कहती है मुझसे ढेरों बातें

जो सिर्फ मुझको ही मालूम हैं
इन बातों को न कोई समझ सकता है

न कोई जान सकता है

पर आज कल नजाने क्यों

ये मुझसे ही महरूम हैं
शायद मेरी खामोशी से ये भी नाराज हैं

शायद मेरे हाल से ये अभी तक अनजान हैं
ये जो चुप्पी मैंने साधी हुई है

शायद यही वजह है जो ये भी अब

सिसक सिसक कर जाने लगी हैं

मेरी हर फरियाद को ये बिन सुने ही ठुकराने लगी हैं
मैं कहता इनसे राह जाता हूँ के

चंद लम्हे मुझ संग रुकने की ये वजह कोई ढूंढे

पर पल भर में हवा हो जाती हैं

मेरी खिड़की पर पड़ी ये बारिश की बूंदें

पल भर

पल भर और सही,

अपना हाथ थोड़ी देर और थमने दो

एहसास मेरी रूह को

अबतक तुम्हारा हुआ नहीं.
पल भर और सही

मुझे तेरी इन सागर सी गहरी

आंखों में झांकने दो,

इनमे मुझे अपना दीदार अबतक हुआ नहीं.
पल भर और सही

अपने गालों पर तुम्हारी इन बिखरी जुल्फों को

थोड़ी देर और ठहरने दो,

तुम्हारी इस बेफिक्र सूरत को

अभीतक जी भरके मैंने देखा नहीं.
पल भर और सही

तू थोड़ा और ठहरजा, आखरी मुलाकात समझ कर ही सही

के मैंने कैद इस लम्हे को अपने दिल में करलूँ.

क्योंकि आने वाला वक़्त हमारा नहीं है

ख्याल.

मैं ख्यालों का शायर हूँ,

ख्यालों में जी कर लिखता हूँ.

ये हकीकत भी तो मेरी बड़ी चालक,

खुद को अलफाजों में बयान होने नहीं देती.