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शायरी

जन्नतें नसीब हैं जो तू मेरे करीब है,

हासिल एक दूसरे को कर लेना ही तो प्यार नहीं कहलाता है.

जो चंद लम्हे हैं पास अपने, जी लेंगे हम इन्ही को मुक्कदर समझ कर,

ताउम्र साथ निभाना ही तो ऐतबार नहीं कहलाता है.

तो क्या हुआ जो राहें है जुदा अपनी, हम मंज़िल को एक करलेंगे

बुझाकर शामाएँ अपनी रात की चांदनी के लिए सूरज भी तो अपना वादा निभाता है क्योंकि

हर पल हाथों में हाथ डालकर साथ खड़े रहना ही तो साथ नही कहलाता है

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​क्या कभी देखा है तुमने

क्या कभी देखा है तुमने

मेरी इन सुर्ख निगाहों में

कबसे ढूंढें है ये तेरा जिक्र

इन भटकती राहों में

 

कबसे बिछड़े हुए हैं ये दिल अपने

कबसे सोया नहीं हूं मैं

तेरी इन जुल्फ की छाओं में

पर महक अब भी तेरे हुस्न की आती है मुझे

बसी है ये भी कहीं अब तक इन फ़िज़ाओं में

 

मैं कोई भूला हुआ सा ख़याल हूँ तेरा

जो तुझे कभी याद आता नहीं

पर मुझे एहसास होता है अब तक तेरा

अपनी इन बाँहों में

 

तेरी मुस्कुराहटों पर झूमे है ये मन मेरा

है कुछ तो ख़ास बसा तेरी इन अदाओं में

कुछ तो मजबूरी-ए-हालात ने हमको संग होने ना दिया

वरना क्या बात ना थी मेरी दुआओं में

वो लम्हा

मैं बेखुदी के लिए शराब नहीं पीता हूँ.

मैं पीता हूँ लम्हों का एहसास लेने के लिए.

वो लम्हा जिसमे पल भर के लिए ही सही,

मैं तुम्हारे पास होता हूँ.

 

वो लम्हा जब तुम सारी परेशानियां भूल कर,

यूँही मेरे पास आकर लेट जाती हो.

और मैं धीरे से अपने बिखरते जज़बातों को थाम लेता हूँ.

 

वो लम्हा जब तुम्हारी हौले से चलती साँसों की आवाज़ भी,

मेरे कानों तक आती है के,

तुम्हे इतना करीब मैं खुद के पाता हूँ.

 

वो लम्हा जब तुम्हारी बेपरवाह सिसकियों को भी मैं,

तुम्हारी नादानी मान जाता हूँ.

 

वो लम्हा जब तुम्हारी पल पल बढ़ती दिल की धड़कनों को,

मैं यूँही पहचान लेता हूँ.

 

वो लम्हा जब तुम कसकर मेरा हाथ थाम लेती हो,

और मैं धीरे से उनका मिज़ाज जान लेता हूँ.

 

वो लम्हा जब तुम कुछ कहती नहीं हो,

फिर भी मैं तुम्हारे सारे खयाल सुन लेता हूँ.

 

वो लम्हा जब बेफिक्री से बिखरती तुम्हारी ज़ुल्फ़ों को

मैं तुम्हारे जाने बिना ही थाम लेता हूँ.

 

वो लम्हा जब न तुम्हे पाने की ख्वाइश रहती है,

ना ही तुम्हे खोने का डर होता है.

और उस लम्हे में मैं तुम्हे अपना मान लेता हूँ.

 

वो लम्हा जब न हकीकत ना ख़्वाब की मुझे परवाह रहती है

बस एक अलग जहांन में मैं जीता हूँ.

 

वो लम्हा जब थम जाता है ये वक़्त भी मेरे लिए,

और जिस लम्हे का मैं बार बार इंतज़ार करता हूँ.

मैं जीता नहीं जिंदगी बेवजह जीने के लिए,

इन कुछ लम्हों से ही मैं चंद खुशियां अपने लिए छान लेता हूँ.

मैं कभी बेखुदी के लिए शराब नहीं पीता हूँ.

कोई मुझसा उस पार

पलकें उठाकर जब भी मैं देखता हूँ,

एक भूली बिसरी सी सूरत दिखाई देती है.

कोई तो है उसपार मुझसा ही क्योंकि,

सूरत में मुझे उसकी कुछ अपनी सी,

मायूसी दिखाई देती है.

 

बेजान पड़ी आंखे उसकी,

कईं जगी रातों की दास्तां मुझसे कह देती है.

उसकी चुप ख़ामोशी में भी मुझे

दर्द भरी चीखें सुनाई देती है.

 

चेहरे पर पड़ी उसकी,

तमाम छोटी छोटी झुर्रियां,

उसके हालात बयान कर देती है.

बेबस पड़ी पलकें उसकी शायद,

हर रात रो रो कर जान देती है.

 

हर रोज़ मिलते हैं हम एक दूसरे से,

पर ज़बान हम दोनों की हमें कुछ कहने नहीं देती है.

पलकें उठाकर जब भी मैं देखता हूं उसको

आईने में मुझे हर बार सूरत अपनी दिखाई देती है.

बारिश की बूंदें

मेरी खिड़की पर पड़ी ये बारिश की बूंदें

कहती है मुझसे ढेरों बातें

जो सिर्फ मुझको ही मालूम हैं
इन बातों को न कोई समझ सकता है

न कोई जान सकता है

पर आज कल नजाने क्यों

ये मुझसे ही महरूम हैं
शायद मेरी खामोशी से ये भी नाराज हैं

शायद मेरे हाल से ये अभी तक अनजान हैं
ये जो चुप्पी मैंने साधी हुई है

शायद यही वजह है जो ये भी अब

सिसक सिसक कर जाने लगी हैं

मेरी हर फरियाद को ये बिन सुने ही ठुकराने लगी हैं
मैं कहता इनसे राह जाता हूँ के

चंद लम्हे मुझ संग रुकने की ये वजह कोई ढूंढे

पर पल भर में हवा हो जाती हैं

मेरी खिड़की पर पड़ी ये बारिश की बूंदें

ख्याल.

मैं ख्यालों का शायर हूँ,

ख्यालों में जी कर लिखता हूँ.

ये हकीकत भी तो मेरी बड़ी चालक,

खुद को अलफाजों में बयान होने नहीं देती.

पागल दिल

लाख दफा समझया इस पागल दिल को,

के नाजा गली में उसकी तू यूँ बेईज्जत होने.

जिन रास्तों की मंजिल नहीं,

उन रास्तों का सफर मुनासिफ नहीं.